तंत्र साधना के नियम


आप में से जो भी कोई साधक साधना करके कामयाब होना चाहता है, तो उसके लिए यह सूत्र मैं दे रहा हूँ।

साधक के लिए इन नियमों का पालन करते रहना बहुत ज्यादा जरूरी होता है। जो साधक इन नियमों का पालन नहीं करता, उसकी साधना कभी भी सफल नहीं होती।

यह साधना क्षेत्र के ऐसे नियम हैं कि जो नए और पुराने, छोटे और बड़े, कोई भी साधक हो, उन्हें यह मानने ही पड़ते हैं। आशा करता हूँ, यह नियम आपके बहुत काम आएँगे। यह नियम आपकी शक्ति के चिरस्थाई आपके साथ रहने के लिए आपको बताए जा रहे हैं।

क्योंकि कई बार हम सौभाग्य से किसी शक्ति को प्राप्त तो कर लेते हैं, लेकिन वह शक्ति कुछ दिन तक ही हमारे साथ रहती है। उसके बाद वह शक्ति हमारा साथ छोड़ देती है। तो क्या कारण होते हैं? अगर इन नियमों का कोई पालन नहीं करता, तो उसकी कोई भी शक्ति बहुत अधिक समय तक नहीं टिक पाती।

सौभाग्यवश जो एक बार आपको शक्ति प्राप्त हुई है, कोई जरूरी नहीं कि वह शक्ति आपको दोबारा हासिल हो। मैंने ऐसे बहुत सारे साधकों को देखा है कि सौभाग्य से कोई सिद्धि उनको प्राप्त हो गई, लेकिन दोबारा पूरे जीवन में वह लोग अपने माथे को घिसते रह गए, लेकिन उनको वह दोबारा शक्ति प्राप्त नहीं हुई। अतः कई भक्तों को तो इस चक्कर में मैंने मरता भी देखा है।

क्योंकि जरूरी नहीं कि कोई दूसरा आदमी आपको मारे। साधना का क्षेत्र इतना विशाल है कि इसमें एक से एक बड़ा आदमी भरा पड़ा है, जिनके पास आध्यात्मिक और तांत्रिक शक्तियाँ हैं। लेकिन अक्सर जो लोग नियमों को तोड़ देते हैं, वह चाहे कितने भी सिद्ध तांत्रिक क्यों ना हों, उनकी शक्ति नष्ट हो जाती है।

कुछ साधक मेरे साथ जुड़े हुए हैं और जिनकी शक्तियाँ कमजोर पड़ गईं या बाँध दी गईं या अवरोधित कर दी गई हैं, उनको इस बात का विश्लेषण करना चाहिए कि कोई साधना का नियम उनसे टूटा तो नहीं। बस यही ध्यान देने वाली बात है।

साधना के महत्वपूर्ण नियम एवं सूत्र

○ जैसा कि शास्त्रों में बोला गया है—गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वरा। इसका तात्पर्य यह है कि आप जिस भी शास्त्र में दीक्षा लो, बिना गुरु के आपका प्रकाश, आपकी विद्या का प्रकाट्य संभव नहीं है। इसलिए तंत्र क्षेत्र में या किसी भी कर्मकांड में गुरु और गणेश यह पहले पूजा के अधिकारी होते हैं।

○ सबसे पहले जैसे पिता से पुत्र पैदा होता है, वैसे ही गुरु के बिना शिष्य नहीं हो सकता। पहला नियम यह है कि आप गुरु जरूर बनाएं, उनसे ज्ञान प्राप्त करें, उनसे शक्ति दीक्षा अवश्य प्राप्त करें। उनको गुरु दक्षिणा अवश्य प्रदान करें।

○ जिस इष्ट की आप साधना करना चाहते हो, उसके बारे में पूरी जानकारी आपको पहले ही ले लेनी चाहिए।

○ गुरु आपको जो भी मंत्र बताएं, उसके अक्षरों को तोड़-मरोड़ कर कभी भी अपनी बुद्धि लगाने की कोशिश ना करें। जैसा शब्द आपको मिला है, आपको वैसे ही शब्द की साधना करनी है, तभी आपकी साधना सफल होगी।

○ जिस घर में छोटे बच्चे हैं, उस घर में कभी भी कोई तामसिक क्रिया नहीं करनी चाहिए और कोशिश करना चाहिए कि जितनी भी तामसिक व उग्र क्रियाएँ हैं, वह आपको श्मशान इत्यादि में ही करनी चाहिए। घर में प्रवेश करने से पहले जल को स्पर्श कर लेना चाहिए।

○ अपनी महत्वाकांक्षाओं को आगे रखते हुए साधक को विशेष साधना प्राप्त करने के लिए गुरु से कभी भी जिद नहीं करनी चाहिए। अपने गुरु पर पूर्ण विश्वास रखें और याद रखें कि जब आपके गुरुदेव कृपा करने पर आएंगे, तो आपको सब सिद्धियाँ आसन पर बैठे ही प्राप्त हो जाएँगी।

○ इस चीज का विशेष ध्यान आपको साधना काल में रखना होगा कि चमड़े की वस्तुएँ, चाहे वह पर्स हो या बेल्ट हो या जैकेट हो, कुछ भी हो, उसका प्रयोग वर्जित होता है। साधना काल में उन सबका प्रयोग नहीं करना चाहिए।

○ साधना काल में साधक को खटिया, जो बाण से बुनी गई हो, उसका प्रयोग वर्जित होता है। आप तख्ते का प्रयोग कर सकते हो या फिर पूरे साधना काल के दौरान आपको भूमि पर शयन करना होगा।

○ जितना समय तक आपकी साधना चले, उतना समय तक अपने आश्रम के अनुकूल संयम और सदाचार, ब्रह्मचर्य का पालन करें।

○ मंत्र, इष्ट देव और गुरुदेव तीनों पर पूरा भरोसा रखें और पूरे श्रद्धा से किसी भी अनुष्ठान को करें। आपके भाव के ऊपर आपकी साधना की सफलता निर्भर करती है।

○ सप्ताह में या महीने में एक बार अपने इष्ट के प्रति निराहार व्रत का पालन अवश्य करें। शास्त्रों के अनुसार ऐसा करने से आपके इष्ट का निवास व्रत काल में आपकी देह में होता है। उससे आपकी आध्यात्मिक ऊर्जा बढ़ेगी और आप शक्तियों की कृपा के पात्र बन जाएंगे।

○ साधना काल में मांस-मदिरा का सेवन वर्जित होता है। आप कोई भी साधना करो, सामान्य तौर पर मांस और मदिरा वर्जित ही होती है। कुछ विशेष साधनाओं में ही मांस और मदिरा भोग के रूप में देवता को दिया जाता है, फिर भी उसका सेवन खुद नहीं किया जाता।

○ अपने गुरुदेव के अलावा किसी और व्यक्ति से साधना से संबंधित कोई भी बात करना वर्जित होती है। अगर आप किसी व्यक्ति से अपनी साधना के विषय में कुछ बताते हैं, कुछ अनुभव ऐसे होते हैं जो हम लोग भावना-वश होकर बता देते हैं, तो वह साधना खंडित मानी जाती है।

○ आप कोई भी अनुष्ठान करें, लेकिन बिना गुरु के कोई भी अनुष्ठान कभी नहीं करें। यह आपकी सफलता का सूत्र बनेगा।

○ साधना के लिए एकांत स्थान की खोज करें। घर में ऐसी जगह पर साधना करें, जहाँ पर बहुत अधिक ध्वनि आपके कानों तक ना पहुँचे। वह स्थान शुद्ध होना चाहिए।

○ साधना काल में साधक को अपना भोजन खुद ही तैयार करना चाहिए और किसी के घर का पानी भी साधक यदि प्रयोग करता है, तो उसको भोजन दोष लगने की संभावना होती है और उसकी साधना खंडित होने का भय होता है।

○ विशेष बात यह है कि साधना काल में नाखून या बाल कटवाना, शेव करवाना, क्रीम, पाउडर, इत्र, साबुन, सुगंधित तेल—इनका प्रयोग वर्जित है।

○ आप कोई भी साधना किसी भी पद्धति से करो, किसी भी देवता की करो, एक जल का पात्र आपके पास होना परम आवश्यक है।

○ यह बात विशेष तौर पर ध्यान दें कि आप जितने समय के लिए साधना कर रहे हैं, एक दीपक पूरी साधना काल में अखंड ज्योति के रूप में चलेगा और साधना संपन्न होने तक उसे बुझने नहीं देना।

○ कोई भी साधना करनी हो, अगर आपने 40 दिन की साधना करनी है या आपने 21 दिन की साधना करनी है, तो पहले दिन जो समय रखा जाएगा, उसी समय पर प्रतिदिन 1 मिनट कम करते हुए उस समय पर ही बैठना होगा। समय आगे-पीछे नहीं होगा।

○ साधना काल में दिशा सामान्यतः पूर्व रहती है। बाकी सब उस कर्म के ऊपर निर्भर करता है कि आप कैसी साधना कर रहे हो। स्थान, समय और दिशा—ये तीनों पूरी साधना काल में एक ही रहते हैं।

○ आप कोई भी साधना करो, सबसे पहले आपको अपने घर के देवता और पितरों को मनाना होगा। उसके बाद आपको नगर देवता की पूजा देनी होगी। फिर आप विशेष देवता की पूजा कर सकते हैं। तब जाकर ही आपका अनुष्ठान पूरा होगा।

○ साधक को साधना करने से पहले संकल्प लेना होता है। किसी भी अनुष्ठान को अधूरा कभी मत छोड़ो या शुरू ही मत करो।

○ अगर किसी साधना में साधक कभी नागा कर देता है, तो साधना खंडित मानी जाएगी और दोबारा करनी पड़ेगी।

○ जिस अनुष्ठान को आपने करना है, उसके मंत्र को सबसे पहले आपको कंठ करना चाहिए। बिना कंठ किए किसी साधना पर बैठ जाना आपके लिए साधना के समय बहुत कष्टकारी हो सकता है।

○ अनुष्ठान के सभी जप करोगे, जो जल का पात्र आप वहाँ रखोगे, उसे 24 घंटे में बदल देना है। उस जल को किसी पेड़ की जड़ में आप डाल सकते हैं।

○ साधना काल में क्रोध, हिंसा, गाली-गलौज, लड़ाई, चिंता इत्यादि से आपको बचना होगा। क्योंकि जब समुद्र मंथन किया गया था, तब केवल अमृत वहाँ से नहीं निकला था, उसके साथ विष भी निकला था। उसी प्रकार जब हम आत्ममंथन करके किसी मंत्र की साधना करते हैं, तो जरूरी नहीं कि हमें दिव्य शक्ति की प्राप्ति हो। वहाँ से कुछ नकारात्मक शक्तियाँ शुरुआत में जरूर आती हैं।

और ऐसा देखा गया है कि जब आपकी साधना संपन्नता की तरफ जाती है, तो बिना बात के गुस्सा आना आम-सी बात हो जाती है। ऐसे में इसका एक ही इलाज है, वह है मौन रहना।

○ साधना में साधक को किसी भी जीव को नहीं मारना चाहिए।

○ जिस देवता की आप साधना करो, उसका चित्र या विग्रह, कोई मूर्ति या प्रतिमा एक आम की पटिया पर या कपड़ा बिछाकर, उसे फूलों से सुसज्जित करके अवश्य वहाँ रखना चाहिए।

○ साधना शुरू करने से पहले वास्तु शांति, नवग्रह शांति, कलश स्थापन और भूत शुद्धि इत्यादि या तो खुद कर लें या किसी विद्वान ब्राह्मण को बुलाकर उनसे करवा लें। इससे आपकी साधना में सफलता के अवसर बहुत ज्यादा बढ़ जाते हैं।

○ जितने दिन की साधना हो, इतने दिन आपको अपने इष्ट के प्रति फल, फूल, पान, मिठाई, जल इत्यादि जो भी आपने सामान चढ़ाना है, वह सामान ताजा होना चाहिए और 24 घंटे बाद नित्य प्रति उसको बदल देना है। जो सामान वहाँ से चढ़ाया हुआ आप इकट्ठा करोगे, उसे जल में प्रवाहित कर देना है।

○ साधना काल में अपने वस्त्र और जूठे बर्तन इत्यादि, जितने काम होते हैं, वह आपको खुद करने चाहिए।

○ साधना में जब आपको कुछ अनुभव हो, तो कभी भी डरना नहीं चाहिए। साधक को यही याद रखना चाहिए कि यह मेरे द्वारा पैदा की गई ऊर्जा है और इसको मैं ही नियंत्रित कर सकता हूँ, जैसे भगवान नरसिंह को केवल प्रह्लाद भगत ही वश कर पाए। उन अनुभवों को जाने-अनजाने कभी दूसरे आदमी को ना बताएं, वरना आपकी साधना वहीं खंडित हो जाएगी।

○ अपनी किसी भी विशेष क्षमता के ऊपर कभी भी घमंड ना करें, क्योंकि ईश्वर अहंकार का नाश खुद करते हैं।

○ हमेशा सज्जन और विद्वान लोगों की संगति करें और अपने ज्ञान को बढ़ाएं। प्रतिदिन धार्मिक पुस्तकें और ग्रंथों का अध्ययन करें। अपनी क्षमताओं को बढ़ाएं।

○ जैसा गुरु कहे, श्मशान की साधना श्मशान में होती है, कब्रिस्तान की साधना कब्रिस्तान में होती है। घर पर की जाने वाली साधना सौम्य होनी चाहिए। उग्र साधना कभी घर पर नहीं करनी चाहिए, वरना लक्ष्मी जी रूठ जाती हैं।

○ अपने देवता के प्रति होम-अग्यारी नित्य प्रति अवश्य करें। एक समय में केवल एक मंत्र या इष्ट की ही साधना करें।

○ अपनी दिनचर्या का ज्यादा समय जिस इष्ट की आप साधना कर रहे होते हैं, उसके मनन में गुजारें।

साधक भाई-बहनों के लिए विशेष संदेश

साधक भाई-बहनों, अपने अनुभव के आधार पर मैंने यह सब बातें और सूत्र आपको बताए हैं, जो साधना की सफलता के लिए परम आवश्यक हैं। इसलिए कृपया एक बार इनका विश्लेषण अवश्य करें, ताकि आपकी कोई भी की गई साधना निष्फल ना जाए।

जल्दी ही इस वीडियो का मैं दूसरा हिस्सा आपके लिए बनाऊंगा, जिसमें प्रारंभिक मंत्र जो साधना में इस्तेमाल किए जाते हैं, जो होम को जगाने के लिए, देवता को जगाने के लिए, इष्ट को मनाने के लिए प्रयोग आते हैं, वह भी आप सब से साझा करूंगा।

आशा करता हूँ यह वीडियो आपके काम आएगी और आप इससे लाभ उठाएंगे। जिनको ज्ञान नहीं है, वह नए साधक इससे लाभ उठाएंगे।

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⚠️ आवश्यक सूचना: सभी तांत्रिक क्रियाएँ व साधनाएं सिर्फ जानकारी के उद्देश्य से दी गई हैं, गुरु के मार्गदर्शन मे ही कोई साधना व तंत्र क्रिया करें अन्यथा आप पर विपरीत प्रभाव भी हो सकता है। किसी के ऊपर दुरुपयोग न करें एवं साधना मे त्रुटि से होने वाले किसी भी क्षति व हानि के उत्तरदायी आप स्वयं होंगे, शिव शक्ति सेवा धाम तंत्रशक्ति पीठ एवं साधना केंद्र इसके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं होगा।

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