पितृ पक्ष और श्राद्ध का महत्व
15 दिनों का एक पक्ष होता है, दो पक्षों से महीना और सामान्यतः 12 महीनों का एक वर्ष होता है।
इसमें क्रमशः एक से लेकर पंद्रह तिथियाँ होती हैं। पूरे साल में यही 15 तिथियाँ बार-बार आती रहती हैं।
इसीलिए जो कोई मृतक जिस तिथि को मृत्यु को प्राप्त हो, उसी तिथि को उसका श्राद्ध होता है।
इस प्रकार इन पंद्रह तिथियों में पूरे वर्षभर में होने वाले देहावसानों का श्राद्ध इन पंद्रह दिनों में ही किया जाता है।
भारतीय संस्कृति और शास्त्रों में, खास तौर पर गरुड़ पुराण में, मृत्यु और पुनर्जन्म की व्याख्या बहुत ही विस्तृत रूप से बताई गई है।
जिसके अनुसार मृत्यु के बाद केवल अधिभौतिक देह नष्ट होती है, लेकिन आत्मा अमर रहती है। जो मृत्यु के बाद फिर से जीवन चक्र में जन्म लेती है, जिसे पुनर्जन्म कहा जाता है।
हमारे शास्त्रों में जीवित लोगों के साथ-साथ मृत व्यक्तियों को भी भोजन और तर्पण के जरिए मुक्ति दिलाने के बारे में बताया गया है।
आज हम आपको पितृ दोष के लक्षण, कारण और उपचार के बारे में बताते हैं, जिससे आप इसके असर से समय रहते ही बच सकें या कम कर सकें।
प्रेत दोष से कैसे बनता है पितृ दोष?
पितृ दोष क्या होता है?
दरअसल, अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद विधि-विधान से अंतिम संस्कार न किया जाए या किसी की अकाल मृत्यु हो जाए, तो वह प्रेत बनता है।
उस मनुष्य की आत्मा की मुक्ति के लिए विधिवत नारायण बलि करवानी चाहिए। मान्यता के अनुसार, अकाल मृत्यु वाले मनुष्य की नारायण बलि नहीं करवाने पर वह व्यक्ति प्रेत बनता है।
उक्त व्यक्ति से जुड़े परिवार की कई पीढ़ियों तक प्रेत पीड़ा की वजह से पितृ दोष का दंश झेलना पड़ता है। हर प्रकार से कारोबार में नुकसान होता रहता है और वंश वृद्धि में भी रुकावट आती है। परिवार में अशांति होती है। इसके लक्षणों से मुक्ति के लिए जीवनभर उपाय करने की जरूरत बताई जाती है।
पितृ दोष के कुछ सामान्य लक्षण
पितृ दोष के पैदा होने वाले कुछ लक्षण इस प्रकार बताए जाते हैं:
संतान न होना। संतान हो तो विकलांग, मंदबुद्धि या चरित्रहीन होना अथवा जन्म के बाद मृत्यु हो जाना।
नौकरी या व्यापार में हानि, बरकत न होना और बार-बार नुकसान होना।
परिवार में एकता न होना, लड़ाई-झगड़े हर समय बने रहना और अशांति रहना।
घर के सदस्यों में एक या अधिक लोगों का अस्वस्थ होना और इलाज करवाने पर ठीक न होना।
घर के युवक-युवतियों का विवाह न होना या विवाह में विलंब होना।
अपनों के जरिए धोखा मिलना।
दुर्घटनाएँ होना और उनकी पुनरावृत्ति होना।
मांगलिक कार्यों में विघ्न होना।
परिवार के सदस्यों में किसी को मानसिक बाधा होना इत्यादि।
घर में हमेशा तनाव और क्लेश रहना।
अगर आपको अपने घर में कुछ ऐसे ही लक्षण दिखाई दें, तो किसी विद्वान ब्राह्मण से मिलकर उपाय अवश्य करवाएँ।
पितृ दोष लगने के कुछ सामान्य कारण
पितृ दोष के कुछ सामान्य कारण इस प्रकार बताए जाते हैं:
पितरों का विधिवत संस्कार और श्राद्ध न होना।
पितरों की विस्मृति या अपमान।
धर्म विरुद्ध आचरण।
वृक्ष, फल लदे पेड़, पीपल, वट इत्यादि कटवाना।
नाग की हत्या करना, कराना या उसकी मृत्यु का कारण बनना।
गौहत्या या गौ का अपमान करना।
नदी, कूप, तालाब या पवित्र स्थान पर मल-मूत्र विसर्जन करना।
कुल देवता, देवी इत्यादि का अपमान करना।
पवित्र स्थल पर गलत कार्य करना।
पितृ दोष निवारण के उपाय
1. पितृ गायत्री मंत्र जाप और पिंडदान
पितरों के लिए सवा लाख पितृ गायत्री मंत्र का जाप, श्रीमद्भागवत का मूल पाठ, तर्पण और पितरों के लिए पिंडदान योग्य ब्राह्मण से करवाएँ।
2. नारायण बलि और त्रिपिंडी
अगर किसी के घर में प्रेत बाधा हो, तो नारायण बलि और त्रिपिंडी करवाने से वह प्रेत जीव अकाल मृत्यु की प्रेत योनि से छूट जाता है और भगवान नारायण के द्वारा मोक्ष को प्राप्त करता है—ऐसी धार्मिक मान्यता है।
3. सपिंडी संस्कार
यदि परिवार से प्रेत को मुक्ति दिलाकर पितरों में मिलाया जाता है, तो सपिंडी करने के बाद उस परिवार की सभी प्रेत बाधाएँ खत्म हो जाती हैं। आगे जीवन में सुख, शांति और तरक्की का रास्ता साफ हो जाता है—ऐसी मान्यता प्रचलित है।
4. श्राद्ध पक्ष में पितृ तर्पण
श्राद्ध पक्ष में पितृ तर्पण अवश्य करें।
5. विशेष तिथियों पर दान
पंचमी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी, अमावस्या और पूर्णिमा को पितरों के निमित्त दान इत्यादि करें।
6. श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ
घर में भगवद्गीता का पाठ विशेषकर 11वें अध्याय का पाठ नित्य करें।
7. पीपल की पूजा
पीपल की पूजा करें। उसमें मीठा, गंगाजल, जल और दूध चढ़ाएँ तथा दीपक नित्य लगाएँ। पीपल की परिक्रमा करें।
8. हनुमान बाहुक और रुद्राभिषेक
हनुमान बाहुक का पाठ, रुद्राभिषेक और देवी पाठ नित्य करें।
9. श्रीमद्भागवत और गायत्री मंत्र जाप
श्राद्ध पक्ष में घर में श्रीमद्भागवत का मूल पाठ करवाएँ या सुविधानुसार ब्रह्म गायत्री अथवा पितृ गायत्री का सवा लाख पाठ करवाएँ।
10. जीव-जंतुओं को भोजन देना
गाय को हरा चारा डालें।
पक्षियों को सप्त धान्य खिलाएँ।
कुत्तों को रोटी खिलाएँ।
चींटियों को चारा डालें।
11. ब्राह्मण भोज
पितरों की स्मृति में ब्राह्मण भोज करवाएँ।
12. सूर्य को जल अर्पित करना
सूर्य को नियमित रूप से तांबे के पात्र से जल चढ़ाएँ।
पितरों के प्रति श्रद्धा और सम्मान
भारतीय परंपरा में पितरों का स्मरण, श्राद्ध, तर्पण, दान और सेवा को विशेष महत्व दिया गया है। अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा रखना, परिवार के बुजुर्गों का सम्मान करना और जरूरतमंदों की सहायता करना भी अच्छे संस्कारों का हिस्सा है।
